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RE: আমার বাংলা ব্লগ কবিতা উদ্যোগ || অণু কবিতার আসর - ২৩৯

सूरज हमेशा वैसा ही उगता है,
हम एक हल्की हवा की तरह बदलते हैं,
जैसे परछाइयाँ चलती हैं,
एक तेज़ी से भागती सड़क पर।

हमारी भावनाएँ सड़कें हैं,
कठोर किनारे, जहाँ लहरें टकराती हैं,
समय से पीटी चट्टानें
हमारी यात्रा की मूक गवाह हैं।

और अंत में, इतनी दूर चलने के बाद,
हम चले जाते हैं, बिना कोई निशान छोड़े,
न ज्यादा, न कम, बस समुद्र,
अपनी अनंत किरणों में हमें भुलाकर।

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